आप अपने जीवन को जीने के बजाय पल-प्रतिपल, घुट-घुट कर और आंसू बहाकर रोते और बिलखते हुए काटना चाहते हैं या अपने जीवन में प्रकृति के हर एक सुख तथा सौन्दर्य को बिखेरना और भोगना चाहते हैं| यह समझने वाली बात है कि जब तक आप नहीं चाहेंगे और कोई भी आपके लिये कुछ नहीं कर सकता है| यदि सत्य धर्म से जुड़ना चाहते है तो सबसे पहले इस बात को समझ लेना उचित होगा कि आखिर "सत्य-धर्म" क्या है? इस बारे में आगे जानने से पूर्व इस बात को समझ लेना भी उपयुक्त होगा कि चाहे आप संसार के किसी भी धर्म के अनुयाई हों, सत्य धर्म को अपनाने या सत्य धर्म का अनुसरण करने से पूर्व आपको ना तो पिछले धर्म को छोड़ना होगा और ना ही सत्य धर्म को अपनाने के लिए किसी प्रकार का अनुष्ठान या ढोंग करना होगा!
सत्य धर्म में-जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, जन्मपत्री-कुंडली, ग्रह-गोचर कुछ नहीं, केवल एक-"वैज्ञानिक प्रार्थना"-का कमाल और आपकी हर समस्या/उलझन का स्थायी समाधान! पूर्ण आस्था और विश्वास के साथ आप अपनी समस्या के बारे में सत्य और सही जानकारी भेजें, हाँ यदि आप कुछ भी छिपायेंगे या शंकोच करेंगे या गलत सूचना देंगे, तो आपकी समस्या या उलझन का समाधान असम्भव है, क्योंकि ऐसी स्थिति में आप स्वयं ही, अपनी सबसे बड़ी समस्या हैं!-18042011
वैज्ञानिक प्रार्थना : हम में से अधिकतर लोग तब प्रार्थना करते हैं, जबकि हम किसी भयानक मुसीबत या समस्या में फंस जाते हैं! या जब हम या हमारा कोई किसी भयंकर बीमारी या मुसीबत या दुर्घटना से जूझ रहा होता है! ऐसे समय में हमारे अन्तर्मन से स्वत: ही प्रार्थना निकलती हैं| इसका मतलब ये हुआ कि हम प्रार्थना करने के लिये किसी मुसीबत या अनहोनी का इन्तजार करते रहते हैं! यदि हमें प्रार्थना की शक्ति में विश्वास है तो हमें सामान्य दिनों में भी, बल्कि हर दिन ही प्रार्थना करनी चाहिये, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि "हम में से बिरले ही जानते हैं कि सफल और परिणामदायी प्रार्थना कैसे की जाती है?" यही कारण है कि अनेकों बार मुसीबत के समय में हमारे अकेले हृदय से निकलने वाली और सामूहिक प्रार्थना/प्रार्थनाएँ भी असफल हो जाती हैं! हम निराश हो जाते हैं! प्रार्थना की शक्ति के प्रति हमारी आस्था धीरे-धीरे कम या समाप्त होने लगती है! जिससे निराशा और अवसाद का जन्म होता है, जबकि प्रार्थना की असफलता के लिए प्रार्थना की शक्ति नहीं, बल्कि हमारी अज्ञानता ही जिम्मेदार होती है! इसलिये यह जानना बहुत जरूरी है कि सफल, सकारात्मक और परिणामदायी प्रार्थना का नाम ही-‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ है और ‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ ही "कारगर प्रार्थना" है! जिसका किसी धर्म या सम्प्रदाय से कोई सम्बन्ध नहीं है! यह प्रार्थना तो जीवन की भलाई और जीवन के उत्थान के लिये है! किसी भी धर्म में इसकी मनाही नहीं है! जरूरत है इस ‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ को सीखने की पात्रता अर्जित करने और उसे अपने जीवन में अपनाने की|

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हम सब पवित्र आस्थावान और सच्चे विश्वासी बनें ना कि अविश्वासी या अन्धविश्वासी! क्योंकि अविश्वासी या अन्धविश्वासी दोनों ही कदम-कदम पर दुखी, तनावग्रस्त, असंतुष्ट और असफल रहते हैं!
-सेवासुत डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
सत्य-धर्म क्या है? ( What is The Truth-Religion?) कृपया यहाँ क्लिक करें!

18/04/2011

सत्य-धर्म क्या है? ( What is The Truth-Religion?)

हम सभी जानते हैं कि हम में से हर एक व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो, चाहे पुरुष, चाहे वह किसी भी धर्म और किसी भी देश का हो, हर कोई यह दिली इच्छा, तमन्ना और ख्वाहिश रखता है कि-
1-शुरू से अंत तक सदैव उसका स्वास्थ्य अच्छा हो|
2-उसके जीवन में-खुशी, सुख, सुरक्षा, शान्ति और समृद्धि हो|
3-उसे अपने माता-पिता, गुरुजनों और जरूरतमंदों की सच्ची सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हो|

4-उसका स्वस्थ, हंसमुख और सुन्दर जीवन साथी हो तथा आज्ञाकारी, परिश्रमी, सेवाभावी और रचनात्मक प्रवृत्ति के बच्चे हों|

5-उसे अपने माता-पिता, अग्रजों, महान लोगों 

 और गुरुजनों का हर कदम पर 

मार्गदर्शन तथा आशीष मिलता रहे|


6-उसका समाज में नाम और मान-सम्मान हो|


7-वह अपने समाज, देश और मानवता के लिए कुछ अच्छे  कार्य कर सकने में सफल हो सके|



 और



8-जीवन का सम्पूर्ण भोग और उपयोग करते हुए परम शांति को प्राप्त कर सके! (जिसे जीवन चक्र से मुक्ति, स्वर्ग, जन्नत और वैकुण्ठ आदि नामों से जाना जाता हैं)

हर एक व्यक्ति की अपने जीवन में उपरोक्त तथा ऐसी ही अनेक प्रकार और भी उम्मीदें तथा आकांक्षाएं होती हैं, फिर भी हम सभी जानते हैं कि कितने कम लोग होते हैं, जिनकी ये कुछेक उम्मीदें या आकांक्षाएँ आधी-अधूरी या आंशिक रूप से भी पूर्ण हो पाती हैं?

ढेरों, उमंगों, आशाओं, अपेक्षाओं, आशीषों और दुआओं के बावजूद भी हम देखते हैं कि हमारे आसपास गरीब, बीमार, असफल, परेशान, असन्तुष्ट, अशान्त, निराश, तनावग्रस्त और दुखी लोगों की संख्या ही अधिक हैं! और यह संख्या आश्चर्यजनक रूप से हर दिन, बल्कि हर क्षण लगातार बढती ही जा रही है|

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? यह सवाल उठना स्वाभाविक है! संसार में अनेकों धर्मों और संतों के होते हुए भी हमें समाज में हर तरफ, अनेकों प्रकार की  व्यक्तिगत, पारिवारिक, दाम्पत्तिक, यौनिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यवस्थागत और प्रशासनिक विसंगतियॉं देखने को मिलती हैं|

यदि आप अपने आसपास में देखेंगे तो आप पायेंगे कि-

1. कुछ लोगों के पास अपना या अपने परिवार का पेट भरने/पालने के लिये पर्याप्त अन्न तक नहीं है, जबकि कुछ दूसरे ऐसे भी लोग हैं जो अकेले ही हजारों परिवारों का पेट पालने में सक्षम हैं! आखिर ऐसा क्यों?

2. एक ही परिवार में, एक जैसा खाना खाने वाले, एक ही छत के नीचे निवास करने वाले और एक समान सुविधाओं और असुविधाओं में जीवन जीने वाले कुछ सदस्य अत्यन्त दु:खी, अस्वस्थ, अप्रसन्न और तानवग्रस्त रहते हैं, उसी परिवार के दूसरे कुछ सदस्य उसी माहौल में पूरी तरह से प्रसन्न, स्वस्थ और खुश रहते हैं, जबकि कुछ या एक-दो सदस्य सामान्य या औसत जीवन जी रहे हैं| जो न कभी दुखी दिखते हैं, न कभी सुखी दिखते हैं! आखिर ऐसा क्यों?

3. हम देखते हैं की एक ओर तो अनेक अच्छे, सच्चे, दयालु, विनम्र, सुसंस्कृत, दानी और धार्मिक जीवन जीने वाले लोग अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएँ झेलते हुए दु:खी और अभावों भरा जीवन जी रहे हैं, जबकि दूसरी ओर समाज द्वारा कुछ बुरे समझे जाने लोग, जैसे कथित पापी, अत्याचारी, अधर्मी लोग, शराबी, जुआरी, आदि बुरे समझे जाने वाले कार्यों में लिप्त होकर भी न मात्र सुखी और सम्पन्न हैं, बल्कि वे सफल, समृद्ध और स्वस्थ माने जाने वाला जीवन भी जी रहे हैं! आखिर ऐसा क्यों?

4. अनेक व्यक्ति हमेशा परेशान, डरे, सहमे और चिन्ता तथा तनावों से भयभीत और अवसाद से भरा जीवन जी रहे हैं, जबकि कुछ दूसरे लोग शान्ति, सुकून और आत्मविश्‍वास से भरा आनंददायक जीवन जी रहे हैं! आखिर ऐसा क्यों?

5. अनेक लोग दिन-रात लगातार कड़ा परिश्रम करते रहने के बावजूद भी औसत या औसत से भी निम्न स्तर का जीवन जी रहे हैं, जबकि कुछ दूसरे अन्य लोग बहुत कम परिश्रम करके भी उच्चकोटि का विलासितापूर्ण, सुविधा-सम्पन्न और असाधारण जीवन जी रहे हैं! आखिर ऐसा क्यों?

6. कुछ लोग तो असाध्य समझी जाने वाली बीमारी से भी बच जाते हैं और इसके बाद वे लम्बा और सुखी जीवन जीते हैं, जबकि अन्य अनेक लोग साधारण सी समझी जाने वाली बीमारियों से भी नहीं लड़ पाते और असमय प्राण त्यागकर अपने परिवार को मझधार में छोड़ जाते हैं! आखिर ऐसा क्यों?

7. अनेक लोगों का वैवाहिक जीवन कष्ट और तनावमय होकर कुण्ठित हो जाता है, जबकि कुछ लोगों का वैवाहिक जीवन सुखमय और आनंददायक होता है! आखिर ऐसा क्यों?
सवाल उठता है कि क्या आपने कभी उपरोक्त और, या ऐसे ही अन्य अनेकों सवालों का उत्तर खोजने का प्रयास किया है? शायद आपने इस सम्बन्ध में कोई सफल प्रयास नहीं किया है! यदि आपने प्रयास किये हैं और फिर भी -


यदि आपको इन मूलभूत और मानव जीवन से जुड़े सवालों के उत्तर अभी तक नहीं मिलें हैं तो हम विशेष रूप से आप जैसे सभी सच्चे और सरल लोगों के लिये-इन सभी और ऐसी ही हजारों सवालों, समस्याओं, उलझनों, तकलीफों और मुसीबतों का समाधान लेकर आये हैं!


इन समाधानों में आपको-


जादू-टोना,
तंत्र-मंत्र,
जन्म-पत्री-कुंडली,
ग्रह-गोचर,
अनुष्ठान या
ढोंग 

आदि किसी का भी सहारा नहीं लेना होगा, बल्कि आपको केवल 'सत्य-धर्म' की व्यावहारिक और मानव जीवन के लिए जरूरी बातों पर विचार करके, उचित लगने पर इन्हें बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से ग्रहण करना होगा और फिर आपके जीवन में होगा एक-"वैज्ञानिक प्रार्थना" का चमत्कार और साथ ही होगा आपकी हर प्रकार की समस्या, उलझन और अशांति का स्थायी और सरल समाधान!


आगे बढ़ने से पूर्व आपको इस बात को भी समझ लेना चाहिए कि- 

हम जिस माहौल में पले, बढे और संस्कारित हुए हैं, उसमें आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि केवल एक ‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ आपका जीवन बदल देगी| आपके जीवन में चमत्कार कर देगी और आप भी उन कुछ लोगों में शामिल हो जायेंगे, जो सुखी, शान्त, प्रसन्न, उदार, स्वस्थ, सम्पन्न, सर्व-सुविधायुक्त, तनावमुक्त और हर प्रकार से सुखद, सम्रद्ध तथा शांतिमय जीवन जी रहे हैं| ‘‘एक वैज्ञानिक प्रार्थना आपका जीवन बदल देगी|’’ (''A Scientific prayer will change your life.")

लेकिन निर्णय आपको ही करना है| पहला कदम आपको ही बढ़ाना होगा! हम आपको केवल यह विश्वास दिला सकते हैं कि केवल और केवल ‘‘एक वैज्ञानिक प्रार्थना’’ आपके सम्पूर्ण जीवन को बदलने में सक्षम है, बशर्ते आपको अपने आप पर विश्वास हो और आप खुद भी जीवन के प्रत्येक पल को जीने को उत्सुक हो?

हममें से बहुत कम लोग जानते हैं कि हम दु:ख, क्लेश, तनाव, ईर्ष्या, दम्भ, अशान्ति, भटकन, असफलता और अनेकों असत्य डरों से भरे अपने कष्टमय जीवन को सही दिशा में मोड़कर जीवन के असली मकसद (परम शांति) और अपनी सकारात्मक मंजिल को आसानी से कैसे प्राप्त कर सकते हैं!

सत्य धर्म का अनुसरण करते हुए केवल ‘‘एक वैज्ञानिक प्रार्थना आपका जीवन बदल देगी|’’
एक सफल और परिणाम दायी प्रार्थना अर्थात
‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ का नाम ही-"कारगर प्रार्थना" है!
जिसका किसी प्रचलित धर्म या किसी सम्प्रदाय से कोई लगाव या विरोध नहीं है|
यह वैज्ञानिक प्रार्थना तो-
-हर मानव के जीवन की भलाई और मानव जीवन के उत्थान के लिये है! 
-मानव जीवन को सच्चा मानवीय अर्थ देने के लिए है! 
-किसी भी प्रचलित धर्म में 'सत्य-धर्म' द्वारा सिखाई जाने वाली वैज्ञानिक प्रार्थना को अपनाने की मनाही नहीं है! लेकिन यह अमूल्य मानव जीवन आपका अपना है! 


अत: इस जीवन के बारे में निर्णय भी आपको ही करना होगा कि आप इसे कैसे व्यतीत करना चाहते हैं? 

फिर से दौहराना जरूरी है कि इस बारे में निर्णय केवल आपको ही करना है, कि आप अपने जीवन को जीने के बजाय पल-प्रतिपल, घुट-घुट कर और आंसू बहाकर रोते और बिलखते हुए काटना चाहते हैं या अपने जीवन में प्रकृति के हर एक सुख तथा सौन्दर्य को बिखेरना और भोगना चाहते हैं? यह समझने वाली बात है कि जब तक आप नहीं चाहेंगे और कोई भी आपके लिये कुछ नहीं कर सकता है!

यदि हाँ तो सबसे पहले इस बात को समझ लेना उचित होगा कि आखिर "सत्य-धर्म" क्या है? इस बारे में आगे जानने से पूर्व इस बात को समझ लेना भी उपयुक्त होगा कि चाहे आप संसार के किसी भी धर्म के अनुयाई हों, सत्य धर्म को अपनाने या सत्य धर्म का अनुसरण करने से पूर्व आपको ना तो पिछले धर्म को छोड़ना होगा और ना ही सत्य धर्म को अपनाने के लिए किसी प्रकार का अनुष्ठान या ढोंग करना होगा!



धर्म मनुष्य की जरूरत है, अर्थात् धर्म मनुष्य के लिये है, न कि मनुष्य धर्म के लिये! 
(Religion is a human need, that religion is for human, human not for religion!)

हमारा अभी तक का अनुभव और आत्मिक ज्ञान हमें इस बात को बखूबी सिद्ध कर चुका है कि "धर्म मनुष्य के लिये है, मनुष्य धर्म के लिये नहीं है!" इसलिये जिस किसी भी देश की जो भी संस्कृति, नस्ल, जाति या सम्प्रदाय मानव समाज में जरूरी मूलभूत तत्वों और प्राकृतिक और, या मानवीय विचारों व सिद्धान्तों को मान्यता और बढावा देती हैं, वही संस्कृति, नस्ल, जाति या सम्प्रदाय सच्चे अर्थ में धार्मिक कहलाने की हकदार हैं। अत: जो भी धर्म इन मूलभूत तत्वों या विचारों को मान्यता देता है, वही सच्चा और मानवीय धर्म है। अर्थात-"सत्य-धर्म" है! इन मूल तत्वों के बारे में यहाँ पर मित्रों और भक्तजनों की जानकारी के लिये संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है :-

सत्य की कसौटी (Criterion of truth) : हर सच्चे धर्म को सत्य की कसौटी पर, हर बार खरा उतरना ही चाहिए! अन्यथा बिना सत्य की कसौटी पर खरा उतरे कोई भी धर्म अपने लोगों (अनुयाईयों) का भला कर ही नहीं सकता! अत: सच्चे धर्म को मानव जीवन की और धर्म की सच्चाई को जानने, समझने और दूसरों को समझाने के लिये, अपने सभी धार्मिक सिद्धान्तों को मानव के ज्ञान और अनुभव पर आधारित सत्य की कसौटी पर परखने देने के लिये तैयार रहना चाहिये! प्रत्येक धार्मिक अनुयाई को इस बात की पूर्ण स्वतंत्रता और आजादी होनी चाहिये कि वह-शिक्षा, स्वाध्याय, चिन्तन, शोध, समालोचना (Education, self-education, thinking, research, criticism) आदि किसी भी माध्यम से अपने धर्म के नियमों और सिद्धान्तों पर खुली चर्चा कर सके और जरूरी होने पर अपने धर्म की बातों या धारणाओं में सकारात्मक तथा सृजनात्मक सुधार के लिये कदम उठा सके! सच्चे धर्म को वर्तमान मानव के जीवन के अनुकूल बनाने के लिये उसमें जरूरी सुधार करने की धार्मिक मान्यता एवं सुविधा बहुत जरूरी है।

अहिंसा (Non violence) : यदि मानव अहिंसक होगा तो पृथ्वी का प्रत्येक जीव निर्भीक और स्वच्छंद (Bold and opinionated) होगा। अहिंसक मानव ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीव की सुरक्षा करना अपना नैतिक धर्म समझेगा और स्वीकारेगा। इससे प्रकृति एवं पर्यावरण का प्राकृतिक सन्तुलन कायम रह सकेगा। जो प्रत्येक जीव के जीवन के लिये अत्यंत जरूरी है, बल्कि अपरिहार्य (unavoidable) है! प्रकृति और पर्यावरण को संरक्षित करने के लिये (To preserve nature and environment) आज के मशीनी मानव के अंतर्मन (in depth of mind) में "अहिंसा का विचार" (The idea of ​​non-violence) स्थापित और समाहित (Established and Contained) रहना बहुत जरूरी है! क्योंकि "अहिंसा का विचार" (The idea of ​​non-violence) मानव के अंतर्मन (in depth of mind) में स्थापित और समाहित (Established and Contained) हो जाने पर ऐसा मानव प्रत्येक जीव के प्रति दया, स्नेह, सम्मान, सेवा और उपचार जैसे प्राकृतिक और आत्मिक विचारों तथा मूल्यों (Natural and Spiritual thoughts and Values) को बढावा देता है। किसी भी मानव को पूर्ण मानव बनने के लिये उसमें ऐसे अनेक गुण और विशेषताएँ होना बहुत जरूरी हैं।

स्नेह (Affection) : स्नेह देना और पाना प्रत्येक जीव की स्वाभाविक और जन्मजात पवित्र आकांक्षा है। (To Give and receive the affection for every organism is natural and congenital holy aspiration) अत: हर एक इंसान को आपस में एक-दूसरे से और प्रत्येक जीव से स्नेह करने देने की धर्म द्वारा स्वीकृति, आजादी और मान्यता दिया जाना एवं इसकी सुविधा उपलब्ध होना बहुत जरूरी है। यह इसलिये भी बहुत जरूरी है, क्योंकि जहाँ पर लोगों के अंतर्मन में सच्चा स्नेह होता है, वहाँ निर्भीकता और गैर-जरूरी संकोच का आवरण स्वत: ही हट जाता है और स्नेह से आप्लावित (भरे हुए) लोगों के बीच हम अपनी खुशियों के साथ-साथ, अपने निजी दु:ख, सभी प्रकार की उलझन और सभी तकलीफों को भी नि:संकोच आपस में आसानी से बांट पाते हैं। और समाधान भी प्राप्त कर सकते हैं!

सम्मान (Respect) : जिन मानवों के बीच सच्चा स्नेह होता है, उनके मध्य अपने आप ही आपसी सम्मान और सन्तुलन उत्पन्न हो जाता। और जहाँ आपस में सच्चा स्नेह और सम्मान होता है, वहाँ वैयक्तिक, वैवाहिक, पारिवारिक, सामाजिक और व्यापारिक सम्बन्धों में भी स्वाभाविक और जरूरी सन्तुलन अपने आप ही कायम रहता है। इस सबके परिणामस्वरूप समाज में स्वत: ही स्वच्छंद, किन्तु अपराधमुक्त व्यवस्था कायम रहती है। जिससे अपराध और दुराचरण नहीं बढ़ते हैं! ऐसे में मनुष्य के जीवन में राजनीतिक और राजकीय हस्तक्षेप नगण्य होता है! (Political and government interference will be negligible!)  

सेवा (Service) : सच्चा स्नेह, सम्मान के मार्ग पर बढता हुआ अपने आप ही सेवा के भाव (sense of service) में बदल जाता है। जहॉं सच्चा स्नेह, आपसी सम्मान और आपसी सम्बन्धों में सन्तुलन कायम रहता है, वहॉं सेवा की उम्मीद, अपेक्षा या मांग करने या सेवा को खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। जहॉं लोगों के अंतर्मन में सेवा का ऐसा स्वाभाविक भाव पैदा होता है, वहॉं पीढियों के बीच वैचारिक दूरी या अन्य प्रकार की दूरियां पैदा होने का सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि जिन लोगों से आपस में हमारा सच्चा स्नेह या प्रेम (affection or love) होता है, वहॉं आपस में एक दूसरे के सम्मान का स्वत: ही ध्यान रखा जाता है। ऐसी आत्मिक व्यवस्था या माहौल होने पर सेवा की जरूरत महसूस होने से पहले ही, सच्चे लोगों के सेवा को समर्पित हाथ प्रस्तुत हो जाते हैं। ऐसे सच्चे हाथों से की जाने वाली सच्ची सेवा का मूल्य या महत्व, हृदय से या होठों से की जाने वाली प्रार्थना से भी अधिक होता है। क्योंकि प्रार्थना में केवल भाव होता है, जबकि सेवा में हृदय का भाव और शरीर की क्रिया दोनों शामिल होते हैं। इसीलिये सेवा का भाव और सेवा दोनों को ही आध्यात्मिक जगत में उच्चतम शिखर पर सम्मान मिलता है। अत: माता, पिता, गुरु, संत, पति, पत्नी, भाई, बहिन, बीमार, विकलांग, नि:शक्त आदि में से जिस किसी की भी पात्र व्यक्ति की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हो, उसकी सेवा पवित्र हृदय से की जानी चाहिये, लेकिन किसी की भी सेवा तब ही सच्ची सेवा कहलायेगी, जबकि सेवा करने के शारीरिक कर्म के साथ-साथ, सेवा करने वाले और सेवा प्राप्त करने वाले दोनों के हृदय में आपस में सच्चा स्नेह और सम्मान का भाव भी अन्तर्निहित (Inherent) हो। अन्यथा औपचारिकता के लिए की गयी सेवा, सेवा करने वाले सेवक के लिये निरर्थक है और ऐसी सेवा, सेवा प्राप्त करने वाले के ऊपर कर्ज का रूप धारण कर लेती है। इसके साथ-साथ ये बात भी महत्व की है कि अकारण सेवा प्राप्त करना भी अक्षम्य है!

आशीष (Blessing) : जिन लोगों का हृदय पवित्र हो और जिनके हाथ सच्ची सेवा को समर्पित हों, ऐसे सेवकों पर आशीष की बरसात होती है! उनको पवित्र और महान आत्माओं के हृदयों से पवित्रतम भाव से भरा आशीष अर्थात् आशीर्वाद मिलता है और ऐसा आशीष निश्‍चय ही और बहुत जल्दी फलीभूत होता है, लेकिन आशीर्वाद की आकांक्षा (Aspiration) को लक्ष्य करके की जाने वाली सेवा स्वार्थ है। आशीष की उम्मीद और अपेक्षाओं से भरी दिखावटी सेवा निरर्थक है! सेवा का उद्देश्य सामने वाले की शारीरिक या मानसिक जरूरत होना होना चाहिये ना कि खुशामद (Adulation) करना!

प्रार्थना (Prayer) : सत्य और अहिंसा से ओतप्रोत (steeped) सच्चे लोगों के बीच, सदैव सच्चा स्नेह और आपसी सम्मान बना रहता है। ऐसा भाव सेवा के रास्ते आपस में एक दूसरे के हृदय से जुड़ जाता है। जब हृदय के तार आत्मा से जुड़ते हैं तो अपने आप ही ऐसे लोगों के लिये उनके माता, पिता, गुरु, संत, पति, पत्नी, भाई, बहिन, बीमार, विकलांग, नि:शक्त लोगों के हृदय से आशीष की बरसात होती है और ऐसे सेवाभावी लोगों के प्रति, सेवा प्राप्त करने वालों के हृदय में सच्ची और पवित्र प्रार्थना-का जन्म होता है। जब किसी के लिये, कोई ऐसी सच्ची प्रार्थनाएँ करे या हृदय से दुआ या आशीष दे तो सकारात्मक और चमत्कारिक परिणाम निकलते हैं! ऐसी पवित्र प्रार्थनाएँ खुद अपने आपके के लिये, स्वजनों के लिये और दूसरों के लिये केवल सच्चे मन से ही नहीं, बल्कि पवित्र हृदय से स्वत: ही निकलती हैं। लेकिन यहॉं यह भी याद रहे कि सारे ब्रह्माण्ड के मालिक आर्थात् सबके ईश्‍वर द्वारा नकारात्मक, विध्वंसक और परपीड़क प्रार्थनाएँ नहीं, बल्कि सच्ची, सकारात्मक और पवित्र प्रार्थनाएँ हीं सुनी जाती हैं और ऐसी सच्ची तथा सही तरीके से की गयी प्रार्थनाएं ही तत्काल फलीभूत होती हैं। नकारात्मक, विध्वंसक और परपीड़क प्रार्थनाएँ करने पर, उनके परिणाम भी उलटे ही निकलते हैं!

क्षमा (Forgiveness) और पश्चाताप (Repentance) : संसार सागर में मानव को दूसरे अनेक जीवों की तुलना में लम्बा जीवन जीना होता है! ऐसे में अनेक प्रकार की भूलें, गलतियाँ और अपराध होना स्वाभाविक है! कई बार तो इन्सान ऐसी गलती या अपराध कर बैठता है या उससे ऐसी गलती या अपराध हो जाते हैं कि जिन्हें जीवन में सुधारना असंभव होता है! ऐसे उजागर अपराधों के लिये तो समाज और राज्य व्यवस्था दंड देती है! लेकिन बहुत सारे अपराध या गलतियाँ उजागर ही नहीं हो पाते! दोनों ही दशाओं में दोषी व्यक्ति के मन में अपराधबोध (Guilt) जन्म ले लेता है! जिसके कारण ऐसा व्यक्ति दिन-रात परेशान और तनावग्रस्त रहने लगता है! जिसके चलते ऐसे व्यक्ति का और उसके परिवार के लोगों का जीवन कष्टमय हो जाता है! इस प्रकार की परिस्थितियों से निकलने का धार्मिक और सामाजिक मार्ग है-क्षमा और पश्चाताप! लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि दोषी व्यक्ति क्षमा और पश्चाताप करते समय अपने आपको कोसते रहते हैं! जिसके कारण ऐसे लोगों को अपराध की तुलना में कई गुनी सजा, सपरिवार भोगनी पड़ती है! इसके लिये मानव मनोविज्ञान, आध्यात्म, समाज और आपराधिक मनोविज्ञान के बारे में ज्ञान रखने वाले किसी पवित्र हृदयी शुभचिंतक-गुरु का मार्गदर्शन बहुत जरूरी होता है! योग्य गुरु का मार्गदर्शन और आशीष ऐसे लोगों को क्षमा (Forgiveness) और पश्चाताप (Repentance) के जरिये भूलों, गलतियों तथा अपराधों से मुक्ति का मार्ग दिखा सकते हैं! सभी प्रकार की भूलों, गलतियों तथा अपराधों से मुक्ति का सरल और सुगम मार्ग है-"सत्य-धर्म" द्वारा प्रतिपादित(Well-founded)-"वैज्ञानिक प्रार्थना"!

शांति और सफलता (Peace and Success) : कहने को तो ये दो ही शब्द हैं, लेकिन मानव का सम्पूर्ण जीवन इन्हीं दो शब्दों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है! सफलता हर व्यक्ति की चाह होती है और होनी भी चाहिए! इसीलिये सफलता की चाहत में अधिकतर लोग चकरघन्नी बने रहते हैं! सफलता क्या होती है, इसे जाने बिना सफलता की दौड़ में शामिल हो जाते हैं! दु:खद आश्चर्य तो तब होता है, जबकि सफलता के लिए-अनैतिक, अमानवीय, असामाजिक और अनेक बार तो आपराधिक रास्ते अपनाते हुए चिंता, तनाव और बीमारियों से घिर जाते हैं! कुछ तो कानून तोड़ने के कारण कारागृह (jail) में यातनाएं भुगतने को विवश हो जाते हैं! ऐसे हालत में ऐसे व्यथित लोग और उनके परिजन, अधकचरे ज्ञान के भरोसे संत और महात्मा कहलाने वाले कथित ज्ञानी-ध्यानियों के चक्कर में पड़कर शांति और सफलता पाने के लिए गिड़-गिडाते देखे जा सकते हैं! जबकि सच्ची बात तो यह है कि मानव को सच्ची शांति बाहर से नहीं अपने आपके अन्दर से ही मिलती है! और बिना शांति के सफलता मिलना असंभव है! शांति के इस मार्ग को ढोंगी लोगों ने बंद कर रखा है! हमारा स्पष्ट अनुभव है कि मानव के जीवन में 'वैज्ञानिक और यथार्थ ज्ञान के बिना' (Without scientific and exact knowledge) मानव के अंतर्मन में शांति और सफलता की स्थापना असंभव हैं! धर्म का दायित्व है कि मानव को शांति का रास्ता दिखाए, ताकि शांति के रास्ते मानव अपने जीवन को सफल बना सके! इस दिशा में हमने हर आम-ओ-खाश, हर दुखी और पीड़ित स्त्री और पुरुष के लिए 'वैज्ञानिक प्रार्थना की पवित्र अवधारणा' (Holy concept of Scientific Prayer) को प्रस्तुत किया है! जिसके जरिये अपनी भाषा में, अपनी प्रार्थना खुद की जा सकती है!   

वैज्ञानिक प्रार्थना (Scientific Prayer) : आज का मशीनी-युग सरल, आसान या सीधे-सादे लोगों का नहीं, बल्कि उलझे हुए लोगों का युग है! जिसे कलयुग (Last time) भी कहा जाता है! लेकिन सच में यह कल-युग अर्थात मशीनी युग (Machine Time) है! जिसमें मानव अपने आपसे अधिक मशीनों के परिणामों पर विश्वास करता है! बल्कि कड़वा सच तो यह है कि आज का मानव पूरी तरह से मशीनों पर ही निर्भर है! अत: इस कलयुग के जंजाल में उलझे हुए लोगों की निजी, पारिवारिक, वैवाहिक, दाम्पत्तिक, यौनिक, आर्थिक और दूसरी सभी प्रकार की समस्याएँ और तकलीफें भी आपस में बुरी तरह से उलझी हुई हैं! बल्कि उलझी हुई दैनिक समस्याओं और तकलीफों के कारण ही आज के मानव का मन मकड़ी के जाले की तरह उलझा हुआ है! इसके ठीक विपरीत आज का व्यक्ति अपने आपको वैज्ञानिक युग का प्रगतिशील इन्सान भी कहता है! जबकि सचाई यही है कि आज का मानव वैज्ञानिक युग का प्रगतिशील मानव नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों द्वारा अविष्कार की गयी मशीनों का गुलाम (Slave of Machines) है! जिसने अपने पूर्वजों के हजारों वर्षों के अनुभव पर आधारित परंपरागत ज्ञान को खो दिया है! ऐसे भ्रमित और कलयुगी मानव के अवैज्ञानिक मन और मस्तिष्क (Unscientific Mind and Brain) को ठीक करने के लिए 'वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित धार्मिक ज्ञान' (Religious knowledge based on scientific method) की जरूरत है! इसी वैज्ञानिक ज्ञान के पौधे को मानव के अंतर्मन में रोपने के लिए, "सत्य-धर्म" द्वारा हर एक अनुयायी को उसकी तकलीफ और समस्या के निदान और समाधान (Diagnosis and Solution) के लिए अलग-अलग वैज्ञानिक प्रार्थनाएँ सिखायी जाती हैं! और सत्य तो यही है कि वैज्ञानिक प्रार्थना ही 'कारगर प्रार्थना' (Effective Prayer) है! यही वह मार्ग है जो शांति और सफलता के रास्ते 'परम शांति' (Ultimate Peace) का मार्ग प्रशस्त करता है! हम सभी के जीवन का अंतिम लक्ष्य भी 'परम शांति' (Ultimate Peace) ही है! जिसे हमारे पूर्वज-स्वर्ग, वैकुण्ठ, मुक्ति या जन्नत का नाम देते आये हैं! जहाँ परम शांति का वास है!


'परम शांति' (Ultimate Peace) : जैसा कि ऊपर कहा गया है कि हम सभी के जीवन का अंतिम लक्ष्य 'परम शांति' (Ultimate Peace) है और परम शांति का मार्ग, शांति और सफलता के रास्ते ही प्रशस्त होता है! जिसके लिए 'सत्य-धर्म' द्वारा प्रस्तुत सरल जीवन पद्धति और व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों के अनुसार सिखायी जाने वाली 'वैज्ञानिक प्रार्थना' ऐसा आसान और सुगम रास्ता है, जिस पर चलने वाले हर स्त्री और पुरुष के जीवन का अंधकार अपने आप छंटता चला जाता है! जहाँ अंधकार (अज्ञान) का पर्दा हटना शुरू होता है, वहाँ स्वत: ही ज्ञान का प्रकाश फैलना शुरू हो जाता है! इसे इसके विपरीत कहने पर अधिक आसानी से और सरलतापूर्वक समझा जा सकता है! अर्थात-प्रकाश (सत्य के ज्ञान) की अनुपस्थिति ही अंधकार (सत्य का अभाव या समस्या या मुसीबत या बीमारी या तनाव या कलह या असफलता या अशांति आदि) है! और प्रकाश की उपस्थिति (सत्य के ज्ञान की प्राप्ति) ही अन्धकार (अज्ञानता के कारण झेलनी पड़ रही हर प्रकार की तकलीफों) का नाश (अंत) है! अत: 'सत्य-धर्म' का पालन करने वाले हर एक मानव का यह 'अनिवार्य धार्मिक कर्त्तव्य' (Compulsory religious duty) है कि वह 'वैज्ञानिक प्रार्थना' सीखे और 'वैज्ञानिक प्रार्थना' के जरिये अपने जीवन में शांति और सफलता के प्रकाश (सच्चे ज्ञान) की किरणे बिखरने दे, ताकि अंतत: परम शांति का प्रकाश सम्पूर्ण मानव जीवन को अनंत काल तक प्रकाशित कर सके!
   
उपरोक्त के विपरीत-
Contrary to the above -

जो कोई भी धर्म या सम्प्रदाय लोगों या अपने अनुयाईयों में क्षेत्रीयता, जाति, नस्ल, समूह, वर्ण या रंग-रूप के आधार पर भेदभाव करता है या ऐसे भेदभाव को बढावा देने वाले विचारों या साहित्य को बढावा या मान्यता देता है, तो ऐसा करना खुले तौर पर प्राकृतिक न्याय के सार्वभौम सिद्धान्तों और सम्पूर्ण मानवता के खिलाफ अमानवीयता के दुष्प्रचार को बढावा देने के समान अपराध है। ऐसे विचारों या ऐसी सोच को मान्यता देने वाले धर्म को धर्म नहीं, बन्धन कहा जाना चाहिये। जबकि धर्म लोगों को बांधता नहीं, मुक्त करता है।

जो कोई भी धर्म या सम्प्रदाय अपने सिद्धान्तों, विचारों, नियमों या धारणाओं को ही अपने लोगों या अनुयाईयों पर जबरन थोपता हो या जो धर्म अपने सिद्धान्तों, विचारों, नियमों या धारणाओं को अन्तिम सत्य के रूप में मानने के लिये लोगों को बाध्य करता हो या अपने सिद्धान्तों, विचारों, नियमों या धारणाओं की आलोचना करने को अधर्म बतलाता हो, ऐसा धर्म या सम्प्रदाय वैज्ञानिक-खोज, शोध और तटस्थ सोच के दरवाजों को हमेशा को बन्द कर देता है। अत: ऐसा धर्म अवैज्ञानिकता को बढावा देने के कारण अधर्म है।

जो कोई भी धर्म या सम्प्रदाय किसी भी जीव-जन्तु या मानव बलि देने को या मानव के भोजन के लिये मूक जीव-जन्तुओं की हत्या करने को सही ठहराता हो और धार्मिक मान्यता देता हो या ऐसे विचार को बढावा देता है या ऐसा करने को परोक्ष सहमति देता है तो ऐसा धर्म या सम्प्रदाय मानव के अन्दर दया और अहिंसा के भाव को समूल समाप्त करता है और साथ ही ब्रह्माण्ड के दूसरे जीवों के जीवन के महत्व को ही नकारता है। ऐसे धर्म या सम्प्रदाय के अनुयाई सत्य, अहिंसा, स्नेह, सेवा, सम्मान, आशीष और प्रार्थना के पवित्र तथा प्राकृतिक सिद्धान्तों में सच्ची आस्था और श्रृद्धा कभी नहीं रख सकते।

आशा की जा सकती है कि उपरोक्त आधे-अधूरे विवेचन से (क्योंकि यह इतना गहन विषय है, जिसे कभी भी पूर्ण या अंतिम नहीं किया जा सकता) 'सत्य-धर्म' के बारे में कुछ ज्ञान जरूर मिला होगा! फिलहाल के लिये विश्राम! प्रत्येक जीव में विद्यमान परमात्मा सबका भला करे|

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